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  मत्स्य, कूर्म और वराह अवतार – किस ओर संकेत करते हैं? भारतीय परम्परा में भगवान के पहले अवतार को मत्स्य यानी मछली के रूप में जाना जाता है। इसके बाद कछुए और फिर सूअर और इस तरह ये क्रम आगे बढ़ता है। किस ओर संकेत करते हैं ये अवतार? क्रमिक विकास के बारे में जो कुछ भी आदि योगी ने बताया है, वह डार्विन के विकासवाद की परिकल्पना जैसा ही है। डार्विन ने अपने सिद्धांत को केवल डेढ़ सौ साल पहले प्रतिपादित किया था, लेकिन वही बात आज से करीब पंद्रह हजार वर्ष पहले आदि योगी शिव ने बता दी थी। दोनों ने ही एक जैसे क्रम का जिक्र किया है। क्रमिक विकास के बारे में बताते हुए आदि योगी ने कहा था कि जीवन का पहला रूप मत्स्य अवतार था। क्रमिक विकास का सिद्धांत डार्विन का नहीं है, यह तो हमेशा से रहा है। हमने इसके पीछे के विज्ञान को समझा है और हम जानते हैं कि यह हमारे भीतर है। मैं अपने अनुभव से भी यही बात कह रहा हूं। इसका अर्थ हुआ कि ईश्वर मत्स्य के रूप में प्रकट हुए। आपको पता ही है कि चाल्र्स डार्विन ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि इस धरती पर जीवन का प्रथम रूप जल में ही पैदा हुआ, यान...
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  नथनी एक बार कबीरदास जी हरि भजन करते एक गली से निकल रहे थे। उनके आगे कुछ स्त्रियां जा रही थी। उनमें से एक स्त्री की शादी कहीं तय हुई होगी तो उसके ससुरालवालों ने शगुन में एक नथनी भेजी थी। वह लडकी अपनी सहेलियों को बार - बार नथनी के बारे में बता रही थी कि नथनी ऐसी है वैसी है। ये खास उन्होने मेरे लिए भेजी है। बार बार बस नथनी की ही बात। उनके पीछे चल रहे कबीरजी के कान में सारी बातें पड़ रही थी। तेजी से कदम बढते कबीर उनके पास से निकले और कहा- नथनी दीनी यार ने, तो चिंतन बारम्बार, नाक दिनी करतार ने, उनको दिया बिसार। सोचो यदि नाक ही ना होती तो नथनी कहां पहनती ! यही जीवन में हम भी करते है। भौतिक वस्तुओं का तो हमें ज्ञान रहता है परन्तु जिस परमात्मा ने यह दुलर्भ मनुष्य देह दी और इस देह से संबंधित सारी वस्तुऐं, सभी रिश्ते-नाते दिए, उसी को याद करने के लिए हमारे पास समय नही होता।